Narayan Astra Mantra

Benefits-Significance

Narayan Astra Mantra is a most powerful mantra to exterminate each and every negative aspect of life. The mantra safeguards the seeker and his family from enemies, black magic, natural calamities, and battles. The mantra is equally powerful as the Brahmastra mantra.

The Narayanastra is the private spear of Lord Vishnu in his Narayana form. This Astra shoots a volley of millions of fatal rockets simultaneously, the power of which rises in ratio to the resistance of the target.

The only way to safeguard against the Narayanastra is therefore to offer total surrender before the missiles hit, which would cause them to stop and limit the target. It is one of the six 'Mantramukta' spears that could not be opposed. It was also said that it could be used only one time in a war, if one tried to use it twice, it would consume the user's own army.

In Ramayana, only Indrajit owned this weapon. He used the weapon in his last battle against Lakshman but the Astra declined to hurt Adi Shesha.

History

नारायणास्त्र, भगवान विष्णु का वो अस्र हे जिस का उन्होंने अपने नारायण अवतार में उपयोग किया था | ये अस्र लम्बे कालतक अनेको प्रकार के अलग-अलग शस्र और साथ ही अग्नि की वर्षा करता हे | जब भी कोई योद्धा इसका विरोध करता हे, तो इस अस्र का तेज और बढ़ जाता हे और वो पहले से ज्यादा तीव्रता से दुश्मन पर टूट पड़ता हे |

इस अस्त्र की शक्ति तब तक बढ़ती रहती हे जबतक वो योद्धा या तो शरणागती ना लेले, या फिर उसकी मृत्यु ना हो जाये | नारायणअस्र के सामनेसे जिन्दा बचने का सिर्फ एक ही उपाय हे | वो ये की, इसके सामने आत्मसमर्पण कर दे, अपने शस्रो का त्याग करले ले | युद्ध के नियमो के अनुसार निहत्ये पर वार नही किया जा सकता था और इसीकारन ऐसा करने से ये अस्र शांत हो जाता हे |

महाभारत के युद्ध के समय कुरु योद्धा अश्वथामा, जो कौरवो की और से लड़ रहा था उसने नारायणअस्र का प्रयोग पांडवसेना पर किया था | भगवान कृष्ण जो खुद भगवान् विष्णु के अवतार हे यानि भगवां नारायण हे, उन्होंने पांडवो को समझाया की अपने हथियार निचे रखकर इस अस्र को आत्मसमर्पित हो जाओ | यही एक उपाय हे इस से बचने का |

कुछ अभ्यासको के अनुसार ऐसा भी कहा जाता हे की नारायण अस्र का उपयोग एक युद्ध में एकही बार किया जा सकता हे | और अगर कोई योद्धा इसका उपयोग दूसरी बार करता हे. तो, वो योद्धा जो इस अस्र को चलाता हे उसी की सेना को नारायनास्र नष्ट कर देता हे |

कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान जब अश्वथामा ने इस अस्र को चलाया, तब आसमान में ग्यारह रूद्र और चक्र, गदा, त्रिशूल ऐसे लाखो प्रकार के शस्र भी प्रकट हुए थे | पांडवसेना के जिसी भी वीर ने प्रतिकार करने की कोशिश की वो नष्ट हो गया | तब भगवान् कृष्ण ने पांडवसेना को नारायण अस्र के आगे समर्पण करने को कहा |

भगवन कृष्ण की बात मानकर सभी ने ऐसा किया भी, पर भीम ऐसा करना कायरता समझते थे, वे काफी समय तक लढते रहे पर नारायणअस्र के सामने उनकी एक न चली और वे बुरी तरह से थक गए, आखिर पांडवो के समझाने पर उन्होंने भी समर्पण कर दिया था |

Narayan Astra Mantra Advantages

  • नारायणास्त्र मंत्र आरोग्य ,सुरक्षा लम्बी आयु तथा अभय देने वाला है |
  • जिस स्थान पर अस्त्र का नित्य जप होता है, वह स्थान और मनुष्य सर्व तंत्र बाधाओं से विमुक्त रहता है।
  • नारायण अस्त्र के प्रभाव से दृष्टिगत तथा अन्यों विषों कि देह में सक्रमण नहीं होता | ये निश्चित है |
  • जो व्यक्ति संग्राम में इसे अपने अंग में धारण करता है ,वेह निश्चित रूप से शत्रुओ पर विजय प्रापत करता है और उसे कोई विघ्न नहीं होता है | जो लोग पुलिस सुरक्षा बलों आर्मी में है!उन के लिए भी यह कवच बहुत उपयोगी है | उन को घर से बाहर विषम परिस्थितिओं में रहना पड़ता है |
  • अस्त्र द्वारा अभिमंत्रित जल पीने से समस्त शारीरिक रोग विनष्ट होते हैं, अज्ञान का नाश होकर ज्ञान का उदय होता है, ग्रहदोष शान्त होते हैं, अकाल मृत्यु, दुर्घटना से रक्षा होती है और मनुष्य दीर्घायु प्राप्त करता है।
  • भूमि में जहां पर निधि (खजाना) हो, अस्त्र के प्रभाव से उस स्थान पर निवासित भूत, वेताल एवं अन्य सर्प शक्तियां उस स्थान को छोड़कर पलायन कर जाती हैं।
  • इस के प्रभाव से सब सुख और सम्पतियो कि लाभ होता है |
  • बलि आदि की मांग दुष्ट शत्रुओं का भय होने पर अस्त्र का विधिवत प्रयोग किया जाये तो दिव्यास्त्र शत्रुओं को दण्डित करते हैं जिससे शत्रुबाधा का निवारण होता है।
  • दिव्यास्त्र की सम्पूर्ण सिद्धि होने पर वह अस्त्र मनुष्य की आजीवन रक्षा करता है और मरणोपरान्त् मनुष्य देवलोक को प्राप्त करता है।
  • आकाशचरी सूर्य ,भूत ,प्रेत ,पिशाच,ग्रामगाहि,डाकनी शाकनी,बेताल महाबली दानव असुर देवता ाशत योनि नज़र दोष काला जादू प्रभाव सब इस मंत्र के उच्चारण से ही सतम्भित हो जाते है | कोई विघ्न बाधा नहीं पहुंचा पाता सब कुछ नित्य फलित होता है!
  • समस्त गलतिओं के दोष दूर हो जाते है | सभी रोग धीरे -२ नषट हो जाते है |
  • नारायणास्त्र के प्रयोग से दरिद्रता एवं दुर्भाग्य से अति शीघ्र मुक्ति मिलती है। यदि शांतिपूर्वक एक लाख की संख्या में इस अस्त्र को सिद्ध कर लिया जाये तो तेज, आयु, कीर्ति, धन, इन सभी पर मनुष्य अधिकार प्राप्त कर लेता है।
  • अस्त्रों की सिद्धि करते समय स्वप्न में या साधना समय में देवता के साथ अस्त्रों के तेजस्वी (क्षणिक) दर्शन होते हैं।
  • यह मंत्र प्रयोग सभी इच्छानुकूल फलो को देने वाला है | अपने आप में मारन उच्चाटन सतम्भन आदि फल को देने वाला है!
  • ऐसा वचन है की जो मनुषय तीनो कालो में इस का जप करता है उस को सर्वतर विजय प्रापत होती है तथा वह आयु आरोग्य ऐशवर्या ज्ञान विधय पराक्रम और सुख प्रापत करता है इस में संदेह नहीं है |

यह विधि पहले देवराज इंद्र को दी गई थी, जिस ने इस के बल पर सभी असुरो को जीत लिए था | जो वैष्णव नियम से रहता हुआ भक्ति पूर्वक इस का पाठ करता है,उस के सभी कार्य सिद्ध होते है |

इस मंत्र को गोरचन तथा जल के संयोग से भोजपत्र पर लिखे और उस भोजपत्र को अपने शरीर पर कही बांध कर या ताबीज में भर कर बांध ले |  “सर्वरक्षां करोतु में ” यह कहे तो मंत्र धारण करने वाले के सभी विघ्न भाग जाते है | ये मंत्र स्त्री और पुरष कोई भी धारण कर सकता है |

श्री नारायणास्त्र मंत्र

हरिः ॐ नमो भगवते श्रीनारायणाय नमो नारायणाय विश्वमूर्तये नमः श्री पुरुषोत्तमाय पुष्पदृष्टिं प्रत्यक्षं वा परोक्षं वा अजीर्णं पंचविषूचिकां हन हन ऐकाहिकं द्वयाहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिक ज्वरं नाशय नाशय चतुरशीतिवातानष्टादशकुष्ठान् अष्टादशक्षय रोगान् हन हन सर्वदोषान् भंजय-भंजय तत्सर्वं नाशय नाशय शोषय-शोषय आकर्षय आकर्षय शत्रून मारय मारय उच्चाटयोच्चाटय विद्वेषय-विद्वेषय स्तम्भय-स्तम्भय निवारय - निवारय विघ्नैर्हन - विघ्नैर्हन दह दह मथ-मथ विध्वंसय-विध्वंसय चक्रं गृहीत्वा शीघ्रमागच्छागच्छ चक्रेण हत्वा परविद्यां छेदय-छेदय भेदय-भेदय चतुःशीतानि विस्फोटय-विस्फोटय अर्शवातशूलदृष्टि सर्पसिंहव्याघ्र द्विपदचतुष्पद-पद- बाह्यान्दिवि भुव्यन्तरिक्षे अन्येऽपि केचित् तान्द्वेषकान्सर्वान् हन हन विद्युन्मेघनदी - पर्वताटवी - सर्वस्थान रात्रिदिनपथचौरान् वशं कुरु कुरु हरिः ॐ नमो भगवते ह्रीं हुं फट् स्वाहा ठः ठं ठं ठः नमः ।

Hari: Om Namo Bhagwate Shri Narayana Namo Narayanaya Vishwamurtyaye Namah Shri Purushottamay Pushpdrishtam Pratyaksham Va Paroksham Va Aajirnam Panchavishuchikam Han Han Eikahikam Dvayahikam Triyahika Chaturthik Jvaram Nashaya Nashaya Chaturshitivatanashtadashakushthan Ashtadash Kshay Rogan, Han Han Sarv Doshan Bhanjaya-Bhanjay Tatsarvam Naashaya Shoshaya-Shoshaya Aakarshaya Aakarshaya Shatrun Marya Marya Uchtaychaty  Uchtaychaty Vidveshya-Vidveshya Stambhaya-Sthambhaya Nivaray Nivarya Vignairhan- Vighnairhan Daha Daha, Math Math Vindvansya Vindvansaya Chakram, Grihatva Sheegram Aagach Aagach Chakren Hatva Parvidyam Chchedya Chchedya Bhedya Bhedya Chatu: Sheetani Visfotya Visfotya Arshvaat Shool Drishti Sarp Simh Vyagr Dwipad Chatushpad Bahyaandivi Bhuvyantrikshe Anyeapi Kechit Taandweshkan Sarvaan Han Han Vidyunmeghnadi Parvatatavi Sarv Sthan Ratridin Path Chauran Vasham Kuru Kuru Hari: Om Namo Bhagwate Hreem Hum Phat Swaha Tha: Tham Tham Tha: Namah:

Author: Admn

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